
कल्पना कीजिए… एक करीब 3 साल का मासूम बिस्तर से गिरने के बाद जांघ के दर्द से जूझ रहा है। उसका इलाज चल रहा है। लेकिन उसी दौरान उसके फेफड़े के अंदर सांस की नली में चुपचाप एक लोहे का पेंच बैठा हुआ है। न खांसी, न घुटन, न रोना। माता-पिता को भनक तक नहीं।
यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि हरियाणा के जिले नारनौल में रहने वाले के छोटे से बच्चे अनंत (बदला हुआ नाम) की है। इस मौत को मात देकर बच्चे को मौत के मुंह से निकालने का श्रेय जाता है पीजीआईएमएस रोहतक के उन डॉक्टरों को, जिन्हें लोग धरती का भगवान कहते हैं।
पीजीआई के ईएनटी विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ रमन वडेरा ने कैस के बारे में पूरी जानकारी देते हुए बताया कि अनंत 13 जुलाई 2026 को बिस्तर से गिर गया था। बाईं जांघ की हड्डी टूट गई थी। पहले नारनौल अस्पताल में प्लास्टर लगा, फिर 8-9 दिन एक निजी अस्पताल में इलाज चला। 22 जुलाई तक परिवार को लगा सब सामान्य है।
लेकिन जब 23 जुलाई को जांघ के ऑपरेशन से पहले डाक्टरों ने रूटीन छाती का एक्स-रे करवाया तो रेडियोलॉजिस्ट भी चौंक गए। एक्स-रे में दाहिने फेफड़े के निचले हिस्से में एक धातु का पेंच साफ दिखाई दे रहा था। घरवालों को याद भी नहीं था कि अनंत ने कब और कैसे इसे निगल लिया। कोई गवाह नहीं था, कोई लक्षण नहीं था।
तुरंत बच्चे को पीजीआईएमएस रोहतक रेफर किया गया। यहां हुई सीटी स्कैन में पुष्टि हो गई कि पेंच दाहिने ब्रोंकस इंटरमीडियस में फंस चुका है। डॉक्टरों के लिए यह बेहद दुर्लभ और खतरनाक स्थिति थी। पेंच कभी भी सांस की नली को पूरी तरह ब्लॉक कर सकता था। पेंच को बिना ऑपरेशन बाहर निकालना किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि थोड़ी सी गलती से बच्चे की जान पर बन सकती थी।
इस चुनौती को स्वीकारा पीजीआईएमएस के ईएनटी विभाग के सीनियर प्रोफेसर *डॉ. रमन वडेरा और उनकी टीम ने।
डॉ. वडेरा ने रीजिड ब्रोंकोस्कोपी तकनीक के जरिए जनरल एनेस्थीसिया में ऑपरेशन किया। इस प्रक्रिया में गले के रास्ते एक पतली दूरबीन डालकर बिना शरीर पर कोई चीरा लगाए पेंच को ढूंढा गया और सकुशल बाहर निकाल लिया गया।
डॉ रमन वडेरा ने बताया कि करीब 2 घंटे चला ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा। अनंत को कोई जटिलता नहीं हुई और अब वह तेजी से रिकवर कर रहा है। डॉ. रमन वडेरा का कहना है कि अक्सर 6 माह से बड़े बच्चे हर चीज मुंह में डालकर चेक करते हैं। पेंच, नट-बोल्ट, सिक्के, बैटरी, खिलौनों के छोटे पार्ट्स बच्चों के लिए सबसे बड़े दुश्मन हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि कई बार एस्पिरेशन के बाद कोई लक्षण नहीं दिखता, जैसे देवांश के केस में हुआ। डॉ. रमन वडेरा ने कहा कि अगर बच्चा अचानक तेज खांसे, आवाज बैठ जाए या बिना वजह चिड़चिड़ा हो तो तुरंत जांच करानी चाहिए।
विभागाध्यक्ष डॉ जगत सिंह ने बताया कि कुलपति डॉ. एच.के. अग्रवाल के नेतृत्व में अस्पताल में ऐसी आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञ टीम मौजूद है, जिसकी वजह से आज हरियाणा ही नहीं, आसपास के राज्यों के मरीज भी यहां भरोसे के साथ आते हैं।
कुलपति डॉ. एच.के. अग्रवाल ने इस सफल ऑपरेशन पर खुशी जताते हुए कहा कि पीजीआईएमएस प्रदेश का सबसे बड़ा और भरोसेमंद रेफरल सेंटर है। यहां हर रोज प्रदेश और आसपास के राज्यों से जटिल से जटिल मरीज इलाज के लिए आते हैं। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि कुलपति के रूप में उनकी प्राथमिकता हमेशा यही रही है कि मरीजों को एक ही छत के नीचे विश्वस्तरीय जांच, आधुनिक मशीनें और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उपलब्ध हो। इसी सोच के कारण पिछले कुछ वर्षों में पीजीआईएमएस में ट्रामा जैसी सभी सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं को और मजबूत किया गया है। अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी, आईसीयू, वेंटिलेटर, आधुनिक ओटी और डायग्नोस्टिक सुविधाएं मरीजों के लिए लगातार उपलब्ध रहती हैं। गरीब और जरूरतमंद मरीजों को सरकारी योजनाओं के तहत मुफ्त और बेहतर इलाज देने के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
डॉ. एच.के. अग्रवाल ने कहा कि देवांश जैसे दुर्लभ केस में समय पर निदान और डॉ. रमन वडेरा जैसी कुशल टीम ही जान बचाती है। पीजीआईएमएस की यही पहचान है कि यहां तकनीक के साथ इंसानियत भी मिलती है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि छोटे बच्चों को पेंच, सिक्के, बैटरी में और खिलौनों के छोटे पार्ट्स से दूर रखें क्योंकि एक पल की लापरवाही भारी पड़ सकती है।